सीमायें

काश मुझे सीमायोने बताया होता की, मै कही नहीं हु सिवाये तेरे मन मै
जो कहते है की वो आसमान छू सकते है
वो कही ना कही सीमओं में मानतें है
क्यूंकि आसमान की कोई सीमा नहीं होती!

कुदरत मुझे तोहफा देती रही है
आज उसने मुझे एक अलग सोच का तोहफा दियां
पहेली बार मैंने अपनी आत्मा से पूछा
की कैसे होती तू अगर तेरी कोई सीमा नहीं होती
कैसे होता अगर तू आसमान होती!

चलती मै कही भी, लहर की तरह बहती
बिना किसी काले झोंके के आने के डर से
पहनती मै अपनी बूनी हुयी सोच, बिना उसके दबा ले जाने के डर से
सोचती थी मै की पंछी हु मै, की पंछी हु मै
बंधे है पंख जिसके!

आज पता चला ताला भी मैंने लगाया था, और चाबी भी मैंने ही छुपाई थी
सीमओं का बाज़ार है, जिसमे से मैंने कुछ खरीदी
कीमत में मैंने अपनी सोच चुकाई
खुल गयी आंखे, करली बड़ी बड़ी बातें
अपनी ताकत मैंने लगाई है
कुछ जंजीरे टूटी है ,कुछ अभी बाकि है!

अब कोई सीमायें नहीं
क्युकी
आसमान हु मै!

यूविका गुप्ता