अरविंद आई केयर, मदुरै – यात्रा का तीसरा पडाव

जागृति यात्रा की रेल, 28 दिसंबर, 2016 को मदुरै स्टेशन पहुँची । सुबह-सुबह ही अत्यंत मधुर आवाज़ मे सभी यात्रियों को जगा दिया गया । घोषणाएँ हुई, और सभी यात्री नाश्ते के बाद अपने अपने बसों मे ‘अरविंद आई केयर’ पहुँच गए । वहाँ जाने पर सभी जैसे पहली मंजिल की ओर बढ चले ।

बडे से हॉल के बाहर इस अस्पताल के संस्थापक – पद्मश्री “डॉ गोविंदप्पा वेंकटस्वामी” जिन्हें प्यार से ‘डॉ वी’ भी बुलाया जाता है का एक प्रेरक वक्तव्य लिखा था – ‘जब हमारे चित्त का आध्यात्मिक विकास होता है, तो हम विश्व मे सभी से संबंध बना पाते है, और साथ ही यह भी जानने लगते है कि दूसरों की सेवा मे हम स्वयं की ही सेवा कर रहे है‘ । यात्रियों ने जैसे जूते खोलते वक़्त इस पर चिंतन किया ।
अंदर बैठते ही कार्यक्रम शुरु । ‘सोशल अल्फा’ के नाम से एक संस्था के प्रतिनिधि ने बताया कि कैसे इस संस्था और जागृति यात्रा ने साझेदारी की है । ‘टाटा ट्रस्ट’ तो खैर एक विश्वसनीय संस्था है जो समाज मे बदलाव के लिए काफ़ी अरसों से काम कर रही है । ‘स्कूल ओफ़ सोशल एंटरप्रेन्योरशिप’ के भी प्रतिनिधि वहाँ मौजूद थे । सभी ‘नवीनता’ से बढ रहे ‘उद्यम के विकास के लिए सहयोग’ को प्रतिबद्ध थे । आप कोई भी शुरुआत करें : आपसे समान सोच, विचार और सुप्रभाव स्थापित करने वाले लोग तो जुडेंगे ही । जागृति यात्रा की पहल भी कोई अपवाद न रही ।

खैर किसी भी पहल के पीछे एक खास समस्या को हल करने का संकल्प होता है । उसी को ध्यान मे रखते हुए ‘अरविंद आई केयर’ के बारे मे छोटी सी प्रस्तुति देकर यात्रियों को अवगत कराया गया । बताया गया कि विश्व मे करीब साढे चार करोड लोग अंधे है । इनमे से 80 प्रतिशत को या तो टाला जा सकता है या इलाज से सही किया जा सकता है । ‘डॉ वी’ इसे अनावश्यक अंधापन मानते थे और इस संस्था का लक्ष्य भी ‘अनावश्यक अन्धेपन को दूर करना’ ही रखा गया । मोतियाबिंद की सर्जरी मे तो ज्यादा वक़्त भी नही लगता जो दृष्टि हीनता का मुख्य कारक है । उनकी संस्था अब प्रतिवर्ष 11 लाख मरीजों की मदद कर रही है जिनमे से दो लाख सर्जरी हर वर्ष की जाती है । सर्जरी की सफ़लता कई विकसित देशों से भी बेहतर है । पूरे विश्व मे आज इस संस्था पर ‘केस स्टडी’ की जा रही है । 150 से भी अधिक अस्पतालों को ये परामर्श देती है । पाँच अस्पतालों को खोल कर विस्तारण भी किया जा चुका है

ये सूचनाएँ यात्रियों को अभिभूत कर रहे थे । उनके रोमांच को और बढाते हुए एक चालीस मिनट की वीडियो भी दिखाई गई । किस प्रकार दृष्टिहीन हो जाने से एक किसान जिसपे पूरा परिवार भरन-पोषण के लिए निर्भर है – दुखी हो जाता है । किसी को दृष्टि वापिस मिल जाए इससे बडी सहायता और सशक्तिकरण क्या हो सकती है ? यात्रियों मे से कई इससे अत्यंत प्रेरित होकर एक दूसरी दृष्टि को जैसे पा रहे थे – ‘उद्यम से, पहल से बदलाव’ । ‘डॉ वी’ की जीवनी भी अत्यंत प्रेरक कारी रही । उन्होंने स्वयं एक जानलेवा बीमारी से संघर्ष किया और इस दौरान होने वाली पीडाओं ने उन्हें संवेदनशील बनाया । काफ़ी वर्षों तक कुशलतापूर्वक सरकारी चिकित्सीय तन्त्र मे कार्यरत होकर उन्होंने उत्कृष्ट सेवाएँ दी । 58 वर्ष की आयु मे उन्होने ‘अरविंद आई केयर की पहल की’, उसे ‘मैक्डोनल्ड्स’ की तर्ज पर विकसित किया ताकि ये अधिक से अधिक मरीजों की सेवा कम से कम मूल्य मे कर सके । उन्होंने लेंस की लागत 200 डॉलर से 10 डॉलर करने को स्वयं की ही ‘ऑरोलैब’ फ़ैक्ट्री लगाई । बुद्धिमत्ता एवं क्षमता होना ही काफ़ी नही है, कुछ खूबसूरत बदलाव लाने की खुशी भी अनुभव होनी चाहिए ।

‘डॉ अरविंद’ ने सभी यात्रियों को संबोधित किया । उन्होने कहा की ‘मीनाक्षी मंदिर’ करीबन हजार वर्षों से विद्यमान है क्योंकि इसके निर्माण मे दो सौ वर्ष लगे । इसी प्रकार नतीजों को पाने के लिए अधीरता नही बल्कि प्रयत्न और धैर्य की जरूरत है । काफ़ी ईमानदारी से सोचे की कौन सी समस्या आपको सोने नही दे रही । और अगर ऐसी कोई बात है तो पहल रंग लाएगी । ‘डॉ वी’ का ही उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया की उन्होने 58 वर्ष की आयु मे इस संस्था की नींव रखी | आप समय ले सकते है, बस खुद के प्रति ईमानदार बने रहिए । एक मैराथन दौडनी है … और इसके लिए अपने दिल और दिमाग को संतुलित रखते हुए बस चलते ही जाइए ।


अब ये समय उपयुक्त हो चला था कि खुद ‘डॉ अरविंद’ और ‘श्री आर डी तुलसीराज’ यात्रियों के प्रश्नों का जवाब दे । ‘श्री आर डी तुलसीराज’ के परिचय को उनका यह ‘टेड वीडियो’ ही पर्याप्त है ।

https://www.ted.com/talks/thulasiraj_ravilla_how_low_cost_eye_care_can_be_world_class

संस्था मे शुरुआती निवेश, कार्यकारी खाका, और मुफ़्त मे या कम दामों मे सुविधाएँ प्रदान करना कैसे संभव है, यह उन्होंने पूछा । उन्होने उत्तर दिया की इसके लिए ‘बाजार को समझना, सेवाएँ और उत्पादों मे दक्षता, एवं सही नेतृत्व क्षमता वाले लोगों को एक सुप्रबंधित व्यवस्था से जोडना’ आवश्यक है । उन्होंने बताया की एक सुचारु अस्पताल के निर्माण मे तीन से पाँच वर्ष लग जाते है । वो भारत के आठ प्रतिशत दृष्टि रोगियों की सेवा कर पा रहे है और अगर कोई यात्री अपने जिले मे छोटे स्तर पर ही पहल करें तो काफ़ी अच्छा होगा । उनके प्रशिक्षण के तरीके, तेज सुविधाएँ देने के साधन, ये सभी यात्रियों के लिए भी तो एक ‘केस स्टडी’ ही था । ‘डॉ अरविंद’ ने यात्रियों को ‘मास्टरी’ शीर्षक की किताब पढने को कहा जिसके लेखक ‘रोबर्ट ग्रीन’ है ।

 

और फिर क्या था, इतने मानसिक मंथन के बाद कुछ शारीरिक ऊर्जा का भी तो प्रयोग हो । ‘यारो चलो’ – प्रसून जोशी द्वारा रचित गीत पर सभी झूम उठे । अब तक तो सभी यात्रियों को इस गीत पर किस प्रकार नृत्य करना है – याद हो चुका था ।

एक पूर्ववर्ती यात्री ने भी ‘अरविंद आई केयर’ पर एक शानदार वीडियो बनाया है । ‘श्री आशुतोष कुमार’, जो जागृति के कार्यकारी निदेशक है, ने इस वीडियो को औपचारिक रूप से युट्युब पर ‘पब्लिक’ किया ।

https://www.youtube.com/watch?v=Wfsrg7aait8

मदुरै आए यात्रियों ने ‘एंगा मदुरै’ गाने पर भी नृत्य किया, जिसे ‘श्री सनिल जोसेफ’ ने गाया ।

https://www.youtube.com/watch?v=kQyRH40ZFPo

‘जागृति यात्रा’ हर वर्ष ‘अरविंद आई केयर’ आती है और इसी का परिणाम है की एक पूर्ववर्ती यात्री ‘श्री राहुल कोप्पुला’ ने इससे प्रेरित होकर ‘लेंसफ़िट” नाम से एक नवीन उद्यम की शुरुआत की है । यह एक ‘ई कामर्स वेबसाइट है जो चश्मों के साथ नवीन डिजाइनों को जोड रही है । उन्होने इसके लिए ज़रूरी डेढ करोड रुपए का निवेश भी जुटा लिया है । वह भविष्य मे इन उत्पादों को ‘आफ़लाइन स्टोर्स की श्रृंखला’ बनाकर भी उपलब्ध कराएँगे’ ।

इस यात्रा मे ‘मधु’ एवं “हाज़्ररा’, ये दो कलाकार पश्चिम बंगाल से आए है और ये एक अनोखी कला जिसका नाम ‘पट्ट चित्रकारी’ है से हर पडाव के अनुभवों को अपनी कला से प्रस्तुत करते है । साथ ही बडी ही मीठी ‘बंगाली’ भाषा मे गाकर ये इन चित्रों का वर्णन यात्रियों से करते है । मदुरै मे यात्रियों ने तालियों की गड्गडाहट के साथ इन दोनों कलकारों को सम्मान दिया एवं उनसे अपनी कला एवं संस्कृति को जीवंत रखने की सीख भी पाई ।

इसके बाद तो एक अस्पताल के भीतर शायद ही किसी यात्री ने ऐसे स्वादिष्ट भोजन को चखा होगा । यात्रा का यह भी तो लाभ है – पूरे भारत के प्रसिद्ध क्षेत्रीय व्यंजनों से पेटपूजा ।

भोजन के पश्चात, यात्रियों ने ‘ऑरोलैब’, ‘नित्य्ता’, ‘मुफ़्त और समूल्य’ अस्पतालों को अपने अपने समूहों मे देखा । मदुरै मे तो लोग ‘मीनाक्षी मंदिर’ देखने को आते है, पर इन यात्रियों ने समय कम होने के कारण वहाँ न जाकर इस अस्पताल को ही मंदिर समझा । इसके प्रत्यक्ष कार्यों को देखा, अस्पताल के कर्मचारियों से बात चीत की जिसका अन्य कोई विकल्प नही है । यह यात्रा एक अनुभव ही तो है । और अनुभव से मिले ज्ञान का महत्व अलग ही होता है । इन्हीं विशेष अनुभवों को दिल मे सहेजे सभी यात्री वापस बस से स्टेशन रवाना हुए । मदुरै मे उन्हें कुछ खास मिला था । न जाने कितने लोगों को यह अनुभव सुप्रभावित कर पाए – एक दृष्टि दे पाए इसी संतोष के साथ रेल अगले पडाव को चल पडी – ‘श्री सिटी’