आर्ट ऑफ लिविंग केन्द्र में एक दिन

#जागृति यात्रा (27 दिसम्बर, चौथा दिन – तीसरा पड़ाव – बंगलौर)

शांत वातावरण, शरीर को छूती शीतल हवा, ऊर्जापूर्ण परिवेश, सन्नाटे को चीरती हुई युवाओं की श्वांस ध्वनि और लगभग ६०० यात्रियों के इस शांत समूह को निर्देशित करती एक आवाज़ । ये दृश्य था बंगलौर में आर्ट ऑफ लिविंग केन्द्र में श्री श्री रविशंकर जी के सानिध्य में बैठे जागृति यात्रा के युवा यात्रियों के सफ़र के आध्यात्मिक पड़ाव का ।

जीवन की किसी भी यात्रा के दौरान आपके भीतर एक आंतरिक यात्रा साथ- साथ चलती रहती है । जिसे अनुभव करने की आपको आवश्यकता होती है । ये संदेश था जागृति यात्रा के दूसरे पड़ाव आर्ट ऑफ लिविंग (AOL) सेन्टर, बंगलौर के आध्यात्मिक परिवेश का । जागृति जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है एक ऐसी यात्रा जो आपको जाग्रत कर सके  और यही जागृति आपको अपने जीवन के बड़े लक्ष्यों और अपने काम के प्रति उत्साह की ओर ले जाती है जो दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाती है ।

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भारत की सिलिकन वैली कहा जाने वाला बंगलौर जागृति यात्रा का दूसरा पड़ाव था जहाँ  यात्रियों को आर्ट ऑफ लिविंग सेन्टर में आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर जी के सानिध्य में प्रेरक व जीवन को नवदिशा प्रदान करने वाले अनुभवों की प्राप्ति हुई । 1981 में एक पिछड़े और छोटे से विद्यालय के रूप में शुरू हुआ आर्ट ऑफ लिविंग फाउण्डेशन आज दुनिया के लगभग 155 देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हुये लोगों को एक शान्तिपूर्ण जीवन जीने की कला सिखा कर सशक्त बना रहा है । आर्ट ऑफ लिविंग सेन्टर के शांत और स्वच्छ वातावरण में बिताया एक दिन और आध्यात्म गुरू श्री श्री रविशंकर से हुये संवाद से यात्रियों ने नई ऊर्जा का अनुभव किया ।

एक यात्री के प्रश्न पूछने पर कि जीवन में भावनात्मक पहलू को कैसे संतुलित किया जाये,श्री श्री रविशंकर जी मुस्कुराते हुये उत्तर देते हैं कि ‘जैसे आप साइकिल चलाते हुये संतुलन बिठाते हैं, ये ठीक वैसी ही प्रक्रिया है”। साथ ही वो अपने संवाद के दौरान कहते हैं कि “यदि आप सहज होते जा रहे हैं (इफ यू आर सेट इन टू योर कम्फ़र्ट ज़ोन) तो इसका तात्पर्य यह है कि आपकी उम्र बढ़ रही है और आप बूढ़े हो रहे हैं क्योंकि जिन कार्यों को करना दूसरों के लिए कठिन होता है उसे युवा बड़े उत्साह से करते हैं ।”

इस आध्यात्मिक सत्र के बाद दूसरे सत्र में यात्रियों को ‘माइन्ड ट्री’ के संस्थापक डॉ. एन.एस.पार्थासारथी से रूबरू होने का मौक़ा मिला जिन्होंने यात्रियों को माइन्ड ट्री के इतिहास से रूबरू कराया । ‘माइन्ड ट्री’ की शुरूआत 1998 में हुई थी जो कि वर्तमान में 700 मिलियन डॉलर की संस्था बन चुकी है । यह भारत की 7 सफल आईटी सर्विस प्रोवाइडर कम्पनियों में से एक है । डॉ. पार्थासारथी कहते हैं कि उन्हें इन्सानों को रिसोर्स यानि स्त्रोत कहना बिल्कुल भी पसन्द नहीं था इसलिए उन्होंने इसे माइन्ड ट्री नाम दिया और वो अपने कर्मचारियों को ‘माइन्ड ट्रीज़ ट्री’ यानि बौद्धिक वृक्ष कहकर बुलाते हैं । माइन्ड ट्री का नामकरण तत्कालीन स्टार्टअप कम्पनी के नेम इट के द्वारा किया गया । डॉ. पार्थासार्थी बताते हैं कि किसी भी उद्यम या किसी भी उत्पाद की शुरूआत के लिए उसका नाम कितना महत्वपूर्ण होता है । वो पजेरो गाड़ी का उदाहरण देते हुये कहते हैं कि यूरोप में इस शब्द का अर्थ अच्छा नहीं है और इसे बहुत बुरा माना जाता है इसलिये इस गाड़ी को वहां विपरीत प्रतिक्रिया झेलनी पड़ी इसलिये किसी भी उद्यम, कम्पनी या उत्पाद का नाम वैश्विक रूप से स्वीकार किया जाने वाला होना चाहिये । डॉ. पार्थासारथी बताते हैं कि किसी भी संस्था के लिए लक्ष्य, उद्देश्य, मूल्य, आंतरिक संरचना (डीएनए) और उनका क्रियान्वयन अत्यन्त आवश्यक तत्व हैं ।

श्री श्री रविशंकर और डॉ. पार्थासारथी जैसे दो ऊर्जावान एवं प्रेरक व्यक्तित्वों (रोल-मॉडल्स) को सुनने के बाद दूसरे ही सत्र में ‘डिजिटल इंडिया’ विषय पर पैनल चर्चा हुई जिसके माध्यम से यात्रियों को डिजीटल उद्यमियों से रू-ब-रू होने का मौक़ा मिला ।

योर स्टोरी डॉट इन’ नाम से वेब पोर्टल चलाने वाली श्रद्धा शर्मा ने पैनल चर्चा की शुरूआत ‘फिश एण्ड फन’ नाम की प्रेरक कहानी सुनाते हुये की जिसके तहत उन्होंने युवाओं को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित और केन्द्रित रहने का सुझाव दिया । साथ ही इस चर्चा के दौरान युवाओं को हाऊसिंग डॉट कॉम के संस्थापक राहुल यादव, शैक्षिक क्षेत्र में काम करने वाली स्प्रिंग वर्ल्ड वेबसाइट की संस्थापक पारूल गुप्ता, पार्सल डॉट इन से क्षितिज और बिलाँग संस्था के संस्थापक विजय  जैसे युवा उद्यमियों के विचार और उनके वेन्चर की शुरूआत में आई समस्याओं और चुनौतियों से जूझने के उनके अनुभवों को सुना । इस तरह यात्रा का दूसरा पड़ाव बंगलौर यात्रियों को आध्यात्म,आईटी क्षेत्र और डिजिटल भारत से रू-ब-रू कराते हुए गुज़रा और अपने तत्कालीन घर जागृति रेल में लौटने के पश्चात् यात्रियों ने भिन्न समूहों में इन विषयों पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया ।