Nikhil aboard the Jagriti Express

Ideation, self-realisation, traveling, knowing about one’s country up close and much more figure among the motivations that bring Yatri’s onboard this Jagriti yatra. While the reasons for joining this journey may be varied, there is one underlying theme uniting them all, the burning desire ‘To make a difference’.

The participants, like many others, may be at crossroads in their lives, struggling to figure out the channels to achieve success in their lifetime but what success means to them uniquely positions them in that ‘crazy’, ‘outliers’ pool who are stupid but bold enough to have the conviction that what all can be imagined is achievable. Dreams for them are not something one experiences with eyes closed, they dream in broad daylight while working towards their realisation. Impossible to them means ‘I am possible’ and hard work is their second nature like the role models they meet. You may term them foolish but can’t ignore the wisdom of their dreams, you may find them young but can’t ignore the maturity of their thought process, you may be eager to sideline them as an eccentric breed but can’t ignore their centerpiece vision. This is what makes this journey special, this is what makes it unparallel.
The one of its kind melting pot of cultures, purpose, vision, and learning give this yatra an enviable pedestal. The carefully handpicked role models give the fantastic participants a sneak into the real world. While Aravind Eye Care organisation in Madurai teaches you to find the joy of doing something beautiful in life, the Kalkeri Sangeet Mahavidhyala in Dharwar puts you in front of Adam Woodsworth from UK whose excellent work in liberal arts and education space in the region teaches you that countries and borders are irrelevant when it comes to serving humanity. Sri City in Nellore teaches you to dream big and scale while Mr. Osama Manzar taught to go out there in the world without the fear of failure. With thoughts like “Youth are not useless, but used less” and “Entrepreneurship is not cool but one that begets sacrifices and effort of the highest order”, you can’t help but feel inspired and humbled at the same time.

With the second half of the Yatra yet to play out, packed with enthralling lineup and participants infused with energy and optimism, I cannot imagine a better way to bid adieu to 2016, traveling, exploring, learning on a moving workstation called the “Jagriti express”.

Nikhil currently resides in Delhi. He is 25 years old and has done his Bachelor’s from Delhi Technological University. He worked with J.P. Morgan in Mumbai before moving to the World Bank Group in Delhi where he works presently. He came to know about the Yatra from his brother who recommended it as a “must do thing in life”.

अरविंद आई केयर, मदुरै – यात्रा का तीसरा पडाव

जागृति यात्रा की रेल, 28 दिसंबर, 2016 को मदुरै स्टेशन पहुँची । सुबह-सुबह ही अत्यंत मधुर आवाज़ मे सभी यात्रियों को जगा दिया गया । घोषणाएँ हुई, और सभी यात्री नाश्ते के बाद अपने अपने बसों मे ‘अरविंद आई केयर’ पहुँच गए । वहाँ जाने पर सभी जैसे पहली मंजिल की ओर बढ चले ।

बडे से हॉल के बाहर इस अस्पताल के संस्थापक – पद्मश्री “डॉ गोविंदप्पा वेंकटस्वामी” जिन्हें प्यार से ‘डॉ वी’ भी बुलाया जाता है का एक प्रेरक वक्तव्य लिखा था – ‘जब हमारे चित्त का आध्यात्मिक विकास होता है, तो हम विश्व मे सभी से संबंध बना पाते है, और साथ ही यह भी जानने लगते है कि दूसरों की सेवा मे हम स्वयं की ही सेवा कर रहे है‘ । यात्रियों ने जैसे जूते खोलते वक़्त इस पर चिंतन किया ।
अंदर बैठते ही कार्यक्रम शुरु । ‘सोशल अल्फा’ के नाम से एक संस्था के प्रतिनिधि ने बताया कि कैसे इस संस्था और जागृति यात्रा ने साझेदारी की है । ‘टाटा ट्रस्ट’ तो खैर एक विश्वसनीय संस्था है जो समाज मे बदलाव के लिए काफ़ी अरसों से काम कर रही है । ‘स्कूल ओफ़ सोशल एंटरप्रेन्योरशिप’ के भी प्रतिनिधि वहाँ मौजूद थे । सभी ‘नवीनता’ से बढ रहे ‘उद्यम के विकास के लिए सहयोग’ को प्रतिबद्ध थे । आप कोई भी शुरुआत करें : आपसे समान सोच, विचार और सुप्रभाव स्थापित करने वाले लोग तो जुडेंगे ही । जागृति यात्रा की पहल भी कोई अपवाद न रही ।

खैर किसी भी पहल के पीछे एक खास समस्या को हल करने का संकल्प होता है । उसी को ध्यान मे रखते हुए ‘अरविंद आई केयर’ के बारे मे छोटी सी प्रस्तुति देकर यात्रियों को अवगत कराया गया । बताया गया कि विश्व मे करीब साढे चार करोड लोग अंधे है । इनमे से 80 प्रतिशत को या तो टाला जा सकता है या इलाज से सही किया जा सकता है । ‘डॉ वी’ इसे अनावश्यक अंधापन मानते थे और इस संस्था का लक्ष्य भी ‘अनावश्यक अन्धेपन को दूर करना’ ही रखा गया । मोतियाबिंद की सर्जरी मे तो ज्यादा वक़्त भी नही लगता जो दृष्टि हीनता का मुख्य कारक है । उनकी संस्था अब प्रतिवर्ष 11 लाख मरीजों की मदद कर रही है जिनमे से दो लाख सर्जरी हर वर्ष की जाती है । सर्जरी की सफ़लता कई विकसित देशों से भी बेहतर है । पूरे विश्व मे आज इस संस्था पर ‘केस स्टडी’ की जा रही है । 150 से भी अधिक अस्पतालों को ये परामर्श देती है । पाँच अस्पतालों को खोल कर विस्तारण भी किया जा चुका है

ये सूचनाएँ यात्रियों को अभिभूत कर रहे थे । उनके रोमांच को और बढाते हुए एक चालीस मिनट की वीडियो भी दिखाई गई । किस प्रकार दृष्टिहीन हो जाने से एक किसान जिसपे पूरा परिवार भरन-पोषण के लिए निर्भर है – दुखी हो जाता है । किसी को दृष्टि वापिस मिल जाए इससे बडी सहायता और सशक्तिकरण क्या हो सकती है ? यात्रियों मे से कई इससे अत्यंत प्रेरित होकर एक दूसरी दृष्टि को जैसे पा रहे थे – ‘उद्यम से, पहल से बदलाव’ । ‘डॉ वी’ की जीवनी भी अत्यंत प्रेरक कारी रही । उन्होंने स्वयं एक जानलेवा बीमारी से संघर्ष किया और इस दौरान होने वाली पीडाओं ने उन्हें संवेदनशील बनाया । काफ़ी वर्षों तक कुशलतापूर्वक सरकारी चिकित्सीय तन्त्र मे कार्यरत होकर उन्होंने उत्कृष्ट सेवाएँ दी । 58 वर्ष की आयु मे उन्होने ‘अरविंद आई केयर की पहल की’, उसे ‘मैक्डोनल्ड्स’ की तर्ज पर विकसित किया ताकि ये अधिक से अधिक मरीजों की सेवा कम से कम मूल्य मे कर सके । उन्होंने लेंस की लागत 200 डॉलर से 10 डॉलर करने को स्वयं की ही ‘ऑरोलैब’ फ़ैक्ट्री लगाई । बुद्धिमत्ता एवं क्षमता होना ही काफ़ी नही है, कुछ खूबसूरत बदलाव लाने की खुशी भी अनुभव होनी चाहिए ।

‘डॉ अरविंद’ ने सभी यात्रियों को संबोधित किया । उन्होने कहा की ‘मीनाक्षी मंदिर’ करीबन हजार वर्षों से विद्यमान है क्योंकि इसके निर्माण मे दो सौ वर्ष लगे । इसी प्रकार नतीजों को पाने के लिए अधीरता नही बल्कि प्रयत्न और धैर्य की जरूरत है । काफ़ी ईमानदारी से सोचे की कौन सी समस्या आपको सोने नही दे रही । और अगर ऐसी कोई बात है तो पहल रंग लाएगी । ‘डॉ वी’ का ही उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया की उन्होने 58 वर्ष की आयु मे इस संस्था की नींव रखी | आप समय ले सकते है, बस खुद के प्रति ईमानदार बने रहिए । एक मैराथन दौडनी है … और इसके लिए अपने दिल और दिमाग को संतुलित रखते हुए बस चलते ही जाइए ।


अब ये समय उपयुक्त हो चला था कि खुद ‘डॉ अरविंद’ और ‘श्री आर डी तुलसीराज’ यात्रियों के प्रश्नों का जवाब दे । ‘श्री आर डी तुलसीराज’ के परिचय को उनका यह ‘टेड वीडियो’ ही पर्याप्त है ।

https://www.ted.com/talks/thulasiraj_ravilla_how_low_cost_eye_care_can_be_world_class

संस्था मे शुरुआती निवेश, कार्यकारी खाका, और मुफ़्त मे या कम दामों मे सुविधाएँ प्रदान करना कैसे संभव है, यह उन्होंने पूछा । उन्होने उत्तर दिया की इसके लिए ‘बाजार को समझना, सेवाएँ और उत्पादों मे दक्षता, एवं सही नेतृत्व क्षमता वाले लोगों को एक सुप्रबंधित व्यवस्था से जोडना’ आवश्यक है । उन्होंने बताया की एक सुचारु अस्पताल के निर्माण मे तीन से पाँच वर्ष लग जाते है । वो भारत के आठ प्रतिशत दृष्टि रोगियों की सेवा कर पा रहे है और अगर कोई यात्री अपने जिले मे छोटे स्तर पर ही पहल करें तो काफ़ी अच्छा होगा । उनके प्रशिक्षण के तरीके, तेज सुविधाएँ देने के साधन, ये सभी यात्रियों के लिए भी तो एक ‘केस स्टडी’ ही था । ‘डॉ अरविंद’ ने यात्रियों को ‘मास्टरी’ शीर्षक की किताब पढने को कहा जिसके लेखक ‘रोबर्ट ग्रीन’ है ।

 

और फिर क्या था, इतने मानसिक मंथन के बाद कुछ शारीरिक ऊर्जा का भी तो प्रयोग हो । ‘यारो चलो’ – प्रसून जोशी द्वारा रचित गीत पर सभी झूम उठे । अब तक तो सभी यात्रियों को इस गीत पर किस प्रकार नृत्य करना है – याद हो चुका था ।

एक पूर्ववर्ती यात्री ने भी ‘अरविंद आई केयर’ पर एक शानदार वीडियो बनाया है । ‘श्री आशुतोष कुमार’, जो जागृति के कार्यकारी निदेशक है, ने इस वीडियो को औपचारिक रूप से युट्युब पर ‘पब्लिक’ किया ।

https://www.youtube.com/watch?v=Wfsrg7aait8

मदुरै आए यात्रियों ने ‘एंगा मदुरै’ गाने पर भी नृत्य किया, जिसे ‘श्री सनिल जोसेफ’ ने गाया ।

https://www.youtube.com/watch?v=kQyRH40ZFPo

‘जागृति यात्रा’ हर वर्ष ‘अरविंद आई केयर’ आती है और इसी का परिणाम है की एक पूर्ववर्ती यात्री ‘श्री राहुल कोप्पुला’ ने इससे प्रेरित होकर ‘लेंसफ़िट” नाम से एक नवीन उद्यम की शुरुआत की है । यह एक ‘ई कामर्स वेबसाइट है जो चश्मों के साथ नवीन डिजाइनों को जोड रही है । उन्होने इसके लिए ज़रूरी डेढ करोड रुपए का निवेश भी जुटा लिया है । वह भविष्य मे इन उत्पादों को ‘आफ़लाइन स्टोर्स की श्रृंखला’ बनाकर भी उपलब्ध कराएँगे’ ।

इस यात्रा मे ‘मधु’ एवं “हाज़्ररा’, ये दो कलाकार पश्चिम बंगाल से आए है और ये एक अनोखी कला जिसका नाम ‘पट्ट चित्रकारी’ है से हर पडाव के अनुभवों को अपनी कला से प्रस्तुत करते है । साथ ही बडी ही मीठी ‘बंगाली’ भाषा मे गाकर ये इन चित्रों का वर्णन यात्रियों से करते है । मदुरै मे यात्रियों ने तालियों की गड्गडाहट के साथ इन दोनों कलकारों को सम्मान दिया एवं उनसे अपनी कला एवं संस्कृति को जीवंत रखने की सीख भी पाई ।

इसके बाद तो एक अस्पताल के भीतर शायद ही किसी यात्री ने ऐसे स्वादिष्ट भोजन को चखा होगा । यात्रा का यह भी तो लाभ है – पूरे भारत के प्रसिद्ध क्षेत्रीय व्यंजनों से पेटपूजा ।

भोजन के पश्चात, यात्रियों ने ‘ऑरोलैब’, ‘नित्य्ता’, ‘मुफ़्त और समूल्य’ अस्पतालों को अपने अपने समूहों मे देखा । मदुरै मे तो लोग ‘मीनाक्षी मंदिर’ देखने को आते है, पर इन यात्रियों ने समय कम होने के कारण वहाँ न जाकर इस अस्पताल को ही मंदिर समझा । इसके प्रत्यक्ष कार्यों को देखा, अस्पताल के कर्मचारियों से बात चीत की जिसका अन्य कोई विकल्प नही है । यह यात्रा एक अनुभव ही तो है । और अनुभव से मिले ज्ञान का महत्व अलग ही होता है । इन्हीं विशेष अनुभवों को दिल मे सहेजे सभी यात्री वापस बस से स्टेशन रवाना हुए । मदुरै मे उन्हें कुछ खास मिला था । न जाने कितने लोगों को यह अनुभव सुप्रभावित कर पाए – एक दृष्टि दे पाए इसी संतोष के साथ रेल अगले पडाव को चल पडी – ‘श्री सिटी’

जागृति एंटरप्राइज़ मेला (जे. ई. एम.), बेंगलुरु

जागृति यात्रा 27 दिसंबर, 2016 को बेंगलुरु शहर पहुँची । यहाँ माउंट कारमेल कॉलेज के सभागार मे 500 युवा उद्यमी यात्रियों के साथ दो आदर्शों ने अपनी उद्यम यात्रा को साझा किया एवं उनके प्रश्नों का जवाब दिया । ये दोनों आदर्श सामाजिक पहलों से सुप्रभाव स्थापित करने मे सफ़ल रहे है । ‘श्रीमती हेमलता अन्नमलाई’ एवं ‘श्री ओसामा मंज़र’ ने बिल्कुल ही निराले अन्दाज़ों मे अपनी कहानियों को साझा किया । हेमलता जी ने ‘दृढ संकल्प के साथ कडी मेहनत,कभी हार न मानने की शक्ति को उद्यम के लिए काफ़ी ज़रूरी बताया । शायद इसी की वजह से उनके ‘एंपीयर’ नाम की संस्था ने ग्रामीण महिलाओं को विद्युत चालित वाहनों को सस्ते दामों मे उपलब्ध करा कर एक स्थिर संस्था का निर्माण किया है । उन्होने ‘योग’ के जरिए युवाओं को स्वस्थ रहने का संदेश दिया, तथा अनुशासित जीवन से भारत मे तकनीक के द्वारा आम आदमी के जीवन मे बदलाव लाने की प्रेरणा दी । महिलाओं को उन्होने एक बेहतर उद्यमी बताया अगर वो अपनी निर्णय शक्ति को आज़ाद रख सके तो ।

‘डिजिटल एम्पावर्मेंट फ़ाउंडेशन’ के ओसामा मंज़र ने पंचायतों एवं सामाजिक संस्थाओं को सूचना क्रांति से जोडने की ज़रूरत बताई । उन्होने अपनी रोचक जीवनी से एक उद्यमी के जोखिम लेने की प्रवृत्ति के कई उदाहरण बताए । साथ ही उन्होने अपनी संस्कृति, विरासत, भाषा, ज्ञान और जो पिरामिड के आधार मे रहने वाले लोग है उनका आदर करने की प्रेरणा दी ।

दोनों आदर्शों से मुलाकात के बाद यात्रियों ने ‘जागृति एंटर प्राइज मेला’ मे भाग लेने वाले नवीन उद्यमियों की प्रदर्शनियों को देखा । मेला इन कार्यक्षेत्रों से संबंधित रहा –

कृषि
शिक्षा
ऊर्जा
स्वास्थ्य
विनिर्माण
जल और स्वच्छता
कला, संस्कृति एवं खेल
प्रोद्योगिकी, वित्त एवं व्यापार सेवाएँ

करीबन पचास नवीन उद्यमों ने इस मेले मे प्रदर्शनी लगाई ।

मेले मे ही ‘संकल्प सामाजिक विकास संस्था’ ने ‘बोर वेल रिचार्ज’ के क्षेत्र मे अपने कार्यों की प्रदर्शनी लगाई । इसके संस्थापक ‘ श्री सिकंदर मीरानायक’ ने अपने गाँव ‘कोटुमचगी, कर्नाटक’ मे पानी की कमी की समस्या को देखते हुए 2008 मे ही इस संस्थान की शुरुआत की । उन्होने बताया कि किसानों को किफ़ायती तरीके से जल की उप्लब्धता कराने मे उन्हें काफ़ी हर्ष की अनुभूति होती है । एक नया ‘बोर वेल’ बनाने मे पानी की किल्लत के साथ साथ खर्च भी अधिक होता है ।

इसी प्रकार ‘लेट्स एन्डोर्स’ ने कई सामाजिक सन्स्थाओं को एक डिजिटल मंच दिया है जिससे वो अपने कार्यों के सुप्रभाव का सफ़ल प्रदर्शन कर ज़रूरी सन्साधनों को पाने के लिए इस मंच पर सहयोगियों से मदद पा सकते है ।

‘बज्ज इंडिया’ नाम की सामाजिक संस्था गाँवों मे एक प्रशिक्षण बस चलाती है, जिसके द्वारा वो महिलाओं के जीवन मे काफ़ी परिवर्तन ला पाई है । उन्हें वित्तीय अव्यवस्था, व्यापार के हुनरों मे कमी, सूचना के अभाव जैसे समस्याओं का सामना करना पडता था- पर ‘बज्ज इंडिया’ ने जागरुकता एवं प्रशिक्षण अभियानों से काफ़ी हद तक इन्हें दूर किया है ।

‘डेली डंप’ की संस्थापिका ने कचडे को ‘डिजाइन थिंकिंग’ से मूल्यवान बनाया, साथ ही कहा की कुछ क्षेत्रों मे समय और समर्पण से ही आप कुछ हासिल कर पाते है ।

कुछ और नवीन उद्यम जिन्होने मेले मे ‘वर्चुअल रीएल्टी’ से लेकर ‘शौच स्वछ्ता’ तक समस्याओं और नवीन समाधानों के हर बिंदु को छुआ । साथ ही श्नाइडर एलेक्ट्रिक, एंपीयर एवं डिजिटल एम्पावर्मेंट फ़ाउंडेशन’ की प्रदर्शनियां तो थी ही ।

इस मेले से यात्रियों को कई नवीन विचारों और उनके सफ़ल क्रियान्वयन का एक जीवंत खाका मिला है । उनके सपने, विचारों और ऊर्जा भरे ख्यालों को अंत मे ‘योर्स ट्रूली थिएटर्स’ ने एक छोटे से कार्यक्रम की प्रस्तुति कर और जवां कर दिया ।

यात्री गीत पर झूमते हुए सभी यात्री ‘उद्यम से भारत निर्माण” के संदेश को अगले पडाव पर ले जाने के लिए पुनः रेल की यात्रा को रवाना हुए ।

 

जागृति यात्रा प्रस्तुत करता है – बिज़ ज्ञान ट्री

बिना प्रतिस्पर्धा के उद्यमी होने का क्या ही मज़ा ? उद्यमी तो हमेशा उस अंतिम मील का लक्ष्य पाने के लिए प्रोत्साहित कदमों के साथ बढ़ता ही जाता है | उसकी प्रेरणा का स्रोत हमें अक्सर दिखाई नही दे पाता |
 
अगर ऐसा है तो फिर एक उद्यमी यात्रा जिसमे ५०० से भी अधिक ऊर्जा से परिपूर्ण युवा उद्यमी या भावी उद्यमी एक रेल मे सफ़र कर रहें हों तो माहौल अपने आप ही प्रतिस्पर्धा से भर जाता है |
 
 बी. जी. टी. एक कार्यशाला जैसे  प्रतिस्पर्धा भरे माहौल मे प्रतिभागियों के लिए ग्रामीण परिवेश मे स्थानीय लोगों से विचार-विमर्श करवाती है | इसमे स्थानीय विशेषग्यो की सहभागिता से यात्री उनके सामाजिक एवं व्यापारिक ज़रूरतों को समझ पाते हैं | तत्पश्चात् संबंधित प्रतिभागी सात कार्यक्षेत्रों मे जिनमे – 
 
कृषि 
शिक्षा
ऊर्जा
स्वास्थ्य
जल
विनिर्माण, और 
कला 
 
आते हैं, व्यापार योजना बनाते हैं एवं विचारों का सृजन और मंथन करते है | ये सात कार्यक्षत्र के तीन आयामों – जिनमे वित्त, मोबाइल और सूचना प्रौद्योगिकी तथा सरकारी निजी कंपनी भागीदारी आते हैं – इन पर प्रमुखता से ध्यान दिया जाता है |
 
बी. जी. टी. की प्रक्रिया दो चरणों मे पूरी की जाती है |
 
– रेल मे यात्रा के दौरान
– यात्रा के पश्चात निवासीय कार्यक्रम 
 
छह से सात लोगों का एक दल तकनीक और वित्तीय दृष्टि से व्यापार-योजना पर मंथन करते है |
 
रेल मे ऐसे सभी दल अपनी-अपनी योजनाओं की प्रस्तुति करते है | ऐसा बरपार, देवरिया के पड़ाव पर संभव हो पाता है क्यूंकी वहाँ पर इस प्रक्रिया के लिए समुचित संसाधन उपलब्ध कराए जाते है | (इन संसाधनों को जान बूझकर सीमित रखा जाता है ताकि यात्री संसाधन की बचत और उनके अधिकांश प्रयोग
 के तरीकों को समझ सकें ) | व्यापार की रणनीति को हर दृष्टिकोण से माप लिया जाता है |
 
हर योजना की उत्कृष्ता का आकलन किया जाता है और जो भी श्रेष्ठतम हैं उन्हें दूसरे चरण के लिए चुना जाता है | देवरिया मे इन विजेताओं को योजनाओं के कार्यान्वयन मे सहयता प्रदान की जाती है | 
 
२०१७ की यात्रा मे तो इस कार्यशाला का सभी को बेसब्री से इंतज़ार है | 

जागृति यात्रा: उद्घाटन समारोह, मुंबई

जागृति यात्रा का उद्घाटन समारोह कल ‘टी आई एस एस’ के सभागार मे सम्पन्न हुआ । इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप मे ‘श्री किशोर माध्यन’ उपस्तिथ थे । उन्होने सभी यात्रियों को जीवंत उदाहरणों से निरंतर सीखते रहने का संदेश दिया ।  साथ ही पुस्तकों के अध्ययन पर उन्होने खासा जोड दिया । उन्होनें कहा की यात्रा की लंबी अवधि के दौरान सीखने के लिए ये ज़रूरी है की यात्री पूर्वाग्रहों का त्याग कर नए अनुभवों के लिए तैयार रहें ।  
 
                                                                              उद्घाटन समारोह, मुंबई
 आदरणीय रेल मन्त्री ‘श्री सुरेश प्रभु‘ ने वीडियो के ज़रिए सभी युवा यात्रियों को ‘डिजिटल भारत’ से सकरात्मक बदलाव लाने के लिए नवीन उद्यम लगाने का सन्देश दिया ।
 जागृति के अध्यक्ष ‘श्री शशांक मणि त्रिपाठी‘ ने अगले बीस वर्षों मे ‘उद्यम से भारत निर्माण’ के लक्ष्य मे  मध्य भारत के युवाओं के ऊर्जा को दिशा देने की तात्कालिकता का एह्सास कराया |
 
इस अवसर पर कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ | ‘जागृति गीत’ पर प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना ‘गौरी शर्मा त्रिपाठी‘ ने सभी युवाओं को झूमाया | 
 
‘जागृति एंटरप्राइज सेंटर – पूर्वांचल‘ के प्रतिकृति का अनावरण भी किया गया जिसे तृप्ति दोशी ने एक दो सौ वर्ष पूराने बरगद के पेड के चारों ओर डिजाइन किया है । 
 
इस केन्द्र मे ही इन्क्युबेटेड ‘देवरिया डिजाइन्स’ की कहानी को ‘पूजा शाही’ और ‘प्रीति’ ने साझा किया | पूजा ने बताया की ‘ज़ागृति ने किस प्रकार ‘देवरिया’ जैसे जिले मे उनके हुनर को पह्चाना, उन्हें सही मार्ग दर्शकों से जोडा जिसके परिणाम स्वरूप उनकी हस्त शिल्प  को दुबई शहर के  प्रदर्शनियों मे स्थान मिल सका । उन्हें विश्वास है कि आने वाला केन्द्र उनके जैसी ग्रामीण परिवेश से आने वाली कई पूजाओं के सपनों को पूरा करेगा ।
 
जागृति यात्रा सम्पूर्ण भारत का परिभ्रमण करेगी, साथ ही उद्यम से भारत निर्माण के लक्ष्य मे यह सभी पडावों से मिट्टी के कणों को लेकर, आने वाले केन्द्र की आधार शिला बनाएगी | 
श्नाइडर एलेक्ट्रिक‘, जो जागृति यात्रा 2016 के मुख्य सहायक है की ओर से अनामिका भार्गव ने भी युवाओं को ऊर्जा के क्षेत्र मे सामाजिक पहल करने की प्रेरणा दी |

जागृति यात्रा: लाइफ़ लाइन एक्सर्साइज

जागृति यात्रा के पहले ही दिन – यात्रियों को एक अनोखी प्रक्रिया से गुजारा गया । इसका नाम ‘लाइफ़ लाइन एक्सर्साइज’ है जो अभी भी जारी है । इसके तहत सभी यात्री अलग-अलग समूहों मे अपने जीवन के अब तक के सभी अनुभवों को सन्क्षिप्त और कभी-कभी विस्तार मे अन्य यात्रियों से साझा करते है । जैसे – जैसे वो अपने जीवन के घटनाओं का वर्णन करते है, वैसे – वैसे ही वो अपनी जीवन रेखा के उतार-चढावों को रेखांकित कर प्रत्यक्ष रोमांच कायम रखते है |

इस प्रक्रिया मे कई यात्री एक दूसरे से घुल-मिल कर एक- दूसरे के प्रति समझ विकसित कर पाते है । उदाहरण-स्वरूप, एक यात्री ने अपने जीवन के उस वक्त का वर्णन किया जब वो अपने जीवन को ही समाप्त करने की सोच पडे थे । खैर, उन्होने ऐसा नही किया और उसके बाद ही उनका चयन ‘वर्ल्ड इकोनोमिक फ़ोरम’ मे हुआ । इससे श्रोता यात्रियों मे कभी हार न मानने के महत्व को समझा ।

एक और युवती ने बताया कि कैसे उन्होने पहली बार अकेले यात्रा की है क्योंकि उनके माता-पिता ने उन्हें लडकी होने के कारण काफ़ी बंदिशों के माहौल मे रखा |फिर भी यात्रा के इस अवसर के लिए उन्होने खुद के निर्णय को सर्वोपरि रखा । उन्होने बताया की उन्हें साहित्य मे रुचि थी, किन्तु फिर भी अन्य लोगों के नज़रिये से प्रभावित हो कर उन्होने ‘वाणिज्य’ की पढाई की| उन्होने काफ़ी खुलकर कुछ शारीरिक रोगों के अनुभवों को भी साझा किया |

ऐसी शिक्षा शायद ही कही मिल पाएं जो यात्रियों को इन वास्तविक जीवन की सच्चाइयों से अनुभव कराता है । साथ ही इस प्रक्रिया ने सभी यात्रियों को विनम्र होने का एक मौका दिया है, क्योंकि बहुत सारे यात्रियों की ज़ीवनी काफ़ी प्रेरित करने वाली रही है । कुछ ने तो सफ़ल उद्यमों की स्थापना कर डाली है और कईयों ने सफ़ल आरामदायक जीवन का परित्याग कर छोटे स्तर पर ही सामजिक पहल कर अन्य लोगों के जीवन की समस्याओं को दूर करने की ठानी है ।

पूरे भारत से, सभी राज्यों से एवं 23 अन्य देशों से आए यात्री न जाने कितने अलग-अलग भाषाओं, कहानियों को साझा कर रहे है | रेल अभी भी भारत के खेतों, पठारों से होकर गुजर रही है | काफ़ी रोमांचक अनुभव है | यात्रा जारी है …

What’s new for this year’s Jagriti Yatra, the world’s longest train journey dedicated to social entrepreneurship?

Following the footsteps of Mahatma Gandhi, who had embarked upon a journey across India almost a century ago, the Jagriti Yatra, an ambitious 8,000 Km train journey spread across 15 days, aims to build a new India through social entrepreneurship.

yourstory-jagriti-yatra

The ninth edition of the Jagriti Yatra commenced on Christmas Eve in Mumbai this year. The 480 ‘yatris’ travelling across the length and breadth of India were selected from among 12,000 registrations and 2,500 applications.

The participants come from across 27 states in India, and 46 other countries. 33 percent of these yatris come from rural India, and 36 percent from semi-urban India. Approximately 40 percent of the ‘yatris’ are women.

Read full story: https://yourstory.com/2016/12/jagriti-yatra-2016/

The Akshaya Patra Foundation – feeding 1.6 million children every year

The Mid Day Meal initiative was conceived in June 2000 by The Akshaya Patra Foundation with a vision that “No child in India shall be deprived of education because of hunger.” With a desire to serve food to those in need, Akshaya Patra envisioned the Mid Day Meal project in schools which also served the underprivileged children. After the success of the

With a desire to serve food to those in need, Akshaya Patra envisioned the Mid Day Meal project in schools which also served the underprivileged children. After the success of the program in Karnataka, it was expanded to other parts of the country as a public-private partnership. The Central and State Governments, as well as individual and institutional funders, have joined hands in implementation of Mid-Day Meal in schools covered by Akshaya Patra. The objectives of the Mid-Day Meal Scheme are to reduce classroom hunger and increase school enrolment and attendance, thereby improving socialization among castes and addressing malnutrition. This is also expected to empower women through employment. The foundation envisions an INDIA free of hunger and poverty. It has an ambitious aim to feed 5 million children by 2020.

This is a sneak peek into their kitchen.

Jagriti Yatra will visit the Foundation in Vizag on the 30th December.

How it Works:

The entire cooking and delivery process in the Akshaya Patra project has been designed such that the nutritive value of the food is maximized, based on a basic set of guidelines prepared by a body of nutrition experts covering food preparation, storage, and supply. The processes are not only standardized but have also been quality tested and certified by ISO. This ensures that hygienic and nutritious food reaches the children. This impact on health was observed to be particularly high on children from very poor families.

This also ensured that cooked food and not food grains were provided to the children. Headmasters of three schools admitted that since food-grains were often supplied in bulk which exceeded the storage capacity of most of the smaller schools, the school authorities were left with no choice but to distribute food grains to the students according to the per head allocation. There was also a noteworthy reduction in the burden of the teaching staff for non-academic activities such as buying grocery, vegetables and fuel wood for cooking. With readymade food being served under the Akshaya Patra Project, the energy and time of the school staff are spared for more productive academic work.

Reference:

  • https://www.akshayapatra.org/impact-of-mid-day-meal-programme
  • https://www.akshayapatra.org/apadmin/uploads/userfiles/images/pdf/hpcl-akshaya-patra-an-impact-study-2013.pdf

Barefoot College by Bunker Roy

In Rajasthan, India, an extraordinary school teaches rural women and men — many of them illiterate — to become solar engineers, artisans, dentists and doctors in their own villages. It’s called the Barefoot College, and its founder, Bunker Roy, explains how it works.

Bunker Roy is a social activist and has given considerable inputs and efforts in the field of education, women empowerment, water scarcity, skill development, drinking water, electrification through harnessing solar power etc. In fact, he was appointed by the Prime Minister Rajiv Gandhi to the Planning Commission of the Indian Government.

He was selected as one of Time 100’s 100 most influential personalities in 2010 for his work in educating illiterate and semi literate rural Indians.

Registered under Friends of Tilona Inc., Barefoot College has been hard at work for the upliftment of rural people, develop their skills, empower women, and encourage discussions over trivial problems faced by them and find out the best possible way out of it. The Social work Research Center founded in 1972 was established after a severe drought had hit many areas. Bunker Roy surveyed around 100 such sites with the aim to find possible solutions and help the residents. He cited water pumps around the villages in both conventional and traditional way and trained the villagers to maintain the pumps and use they efficiently to manage their water woes not only for the present but in times to come. As the center developed they started working on many more domains that ranged from not only water related issues but also empowerment of underprivileged especially women to sustainable development in the resources available with dedication and enthusiasm.

Inspired by Gandhi’s idea of self-sustainability, the center recruits women with minimal or no education and rigorously trains them in solar engineering, electrical engineering, handicrafts etc. which are further sold or used by the villagers themselves. A Village Environment and Energy Committee formed by a few elected villagers carry out discussions on various topics that decide the cost of manufacturing solar panels and methods for effectively implementing the same. The decision is not superficially taken but takes into consideration the poorest household in the village also so that the development is enjoyed by everyone. The discussion is then implemented with the available resources. They also promote the idea ‘learner is a teacher and teacher is a learner’ and encourage them to share their knowledge and train even more people across the barriers of language and nationalities to enhance their skills and knowledge. The center has also expanded its resources to reach out to the needy in other countries in Africa, Asia, and Latin America with a special focus on training women as it rightly believes that educating a woman educated the whole generation.

Their work and methodology have attracted sponsors from various parts of the world which grant the center to make their day to day activities possible. In addition to this, the products such as handicraft items also add to their income after they are sold in the market.

The center is strict about its rules and regulation and firmly believes in values such as austerity, equality, collective decision making, decentralization, self-evaluation, transparency, and accountability. The initiative has touched the lives of many and continues to do so endlessly. Barefoot college has helped Yatris understand that there is a

Andhere se Ujaale ki Or

#WhatJYMeantToYou #JYPoetryProject #JagritiYatra2016

चौबीस की नशीली रात और पाँच सौ के काफ़िले के साथ,
ज़हन में जुनून और मन मे उमंग लिए निकले हम थामे हाथों में हाथ
मंज़िलें थी अनेक पर देश बाहें खोल लगाए बैठा था आस,
इसलिये देश से जोड़ दिये हमने अपने जज़्बात,
जागृति रेल में होकर सवार शुरू की भारत बदलने की बात ||
कोई था दिल्ली से, कोई पुणे से, यात्री थे हर कोने से,
ना भेष ना भाषा बाँधे इनको; बँधे थे बस अपने सपनों से
सबने हाथ मिलाया और किया जागृति गीत का गुणगान,
जीत का ज़ज्बा लिए दिलो में; आरम्भ हुआ हमारा अभियान ॥
हुबली में किया नन्हें सितारों की वाद्य संगीत प्रतिभा ने दंग,
और सीखे हमने सूर्य ऊर्जा व्यवसाय के भेद सेलको के संग,
बेंगलुरु की ‘हॉट कॉफी’ और इन्फोसिस परिसर की हुई टोली दीवानी,
पर उससे भी प्रेरणादायक निकली माइंड ट्री की उद्यम कहानी ॥
मदुरई में अरविन्द नेत्र चिकित्सालय देख भर आये आंसू आँखों में,
सामाजिक और व्यवसायिक सफलता के ऐसे उदाहरण मिले लाखों में,
चेन्नई में मुसाफ़िर पहुंचे रॉयल एन्फील्ड निर्माणशाला,
हज़ारो को रोज़गार देती उदयमिता की थी वो उत्तम पाठशाला ॥
विशाखापट्टनम था अगला पड़ाव जहाँ ‘अक्षयपात्र’ संस्था से हपरिवार,चय,
लाखों बच्चों की क्षुधा शांत कर, पायी जिसने क्रूरता रुपी असुर पर विजय,
काफ़िले ने की कूच गंजम में स्थापित ग्राम विकास की ओर,
जहाँ हमने सीखा थामना और थमाना ग्रामीणों को स्वच्छता और उन्नति की डोर ॥
पल भर में मुसाफ़िर पहुंचे नालंदा विश्वविद्यालय, जहाँ हुए हम अंतरध्यान,
और प्राचीन भारत की विद्वता और गौरव को किया हमने शत् – शत् प्रणाम,
देवरिया था अगला गाँव, जहाँ फैले थे गन्ने और सरसों के खलिहान,
यहीं ठहर कर हम सबने सोचा मध्य भारत की समस्याओं का समाधान ॥
दिल वालों की दिल्ली में अगली रात गूँज उठी अंशु की चीतकार,
उन चंद लम्हों ने ज़हन झकझोरा और मन में खड़ किये सवाल हज़ार ।
अगले ही दिन तिलोनिया में बंकर रॉय की बारी थी
जहाँ दादी और नानी की सौर इंजीनियरिंग देख कर जनता हतप्रभ सारी थी ॥
साबरमती आश्रम था अब अंतिम और यात्रा का पड़ाव सर्वश्रेष्ठ,
गांधी जी के आदर्शों से हमने सीखी प्यार की परिभाषा और त्यागना द्वेष,
आख़िरी चरण में जब प्रण लेके गाया हमने जागृति- गीत,
हाथों में हाथ थामे दिल में महसूस हुई इस यात्रा की जीत ॥
आये थे कुछ अनजान मुसाफ़िर ; अब जायेंगे बनके एक विशाल परिवार,
दिल की चिंगारी को शोला बनाकर उठायेंगे कंधों पर देश का भार,
ख़ुशी, हताशा क्रोध हो चाहे; चाहे हो भ्रष्टाचार की काली रात,
निडर होकर आओ शुरू करें कुछ यूँ ही देश बदलने की बात ॥
जय हिन्द !!

तापस मनी श्याम, JY’14