Kalkeri Sangeeth Vidyalaya, where art and tranquility meets

Destination 1- Hubli

It is day 3 of Jagriti Yatra 2015 and the train has reached Dharwad, a silent town, well-known for its musical culture, in Karnataka. We have our first role model visit to Kalkeri Sangeeth Vidyalaya (KSV) and a case study related to solar electrification project in the locality.

Kalkeri Sangeeth Vidyalaya

A visit to Kalkeri Sangeeth Vidyalaya would certainly inspire anyone to face problems as process and work towards one’s goal, even when it is chasing the incredible. Founded by Adam Woodward, along with Mathieu Fortier and his wife Agathe Meurisse 13 years ago, Kalkeri Sangeeth Vidyalaya (KSV) is now a life changer for more than two hundred children belonging to lower income group.

Children in KSV get academic education with high prominence to music and performing arts in the residential campus which is spread across three acres of land at absolutely free of cost. The tranquillity and beauty of the place gets elevated with simple houses made out of traditional materials, and it creates a serene environment for the children to live and learn peacefully.

Volunteers from all over the world come to this art school and put in dedicated effort to make the children excel in their life. As Mathieu puts it, music has the infinite power to transform a child’s life. It helps to impart certain values like self confidence, concentration, and self-esteem in the child’s mind at an early age. They would certainly try to excel in life.”

Mathieu is absolutely right once we know about Krishnan, a 23 year old teacher of KVS. A gold medallist in music from Karnataka University, he is one among the super successful former students of KVS. Here is what he has to say, “I came to KVS when I was 14 year old. Since then I was able to change my perspective about the world and learned better communication skills while I studied music and that is something I am passionate about. Now I want to give back what I learned and so I joined as a teacher here.”

The first destination itself was thought-provoking and inspirational for the yatris as they were able to spend a day with kids and volunteers of KVS. Furthermore, they had a memorable session with the founders of KVS, which would certainly be an inspiration to work towards a greater goal throughout their life.

कलकेरी के क़िस्से

#जागृति यात्रा (26 दिसम्बर, तीसरा दिन- दूसरा पड़ाव, हुबली)

एक लगभग 10 साल का बच्चा रामू जो दक्षिण भारत के एक छोटे से गाँव में रहता है । जो अंग्रेज़ी और कन्नड़ तो फर्राटे से बोलता ही है, साथ ही वो हिन्दी भी उतनी ही अच्छी तरह से बोलने की कोशिश करता है और सीखने की चाहत रखता है जबकि उसके साथ के बाकी बच्चे जो शायद उम्र में भी उससे बड़े हैं और उसी गाँव के निजी विद्यालय में पढ़ते हैं उनकी समझ इतनी अच्छी नहीं है । रामू से पूछने पर कि वो अपने इन दोस्तों को अपने स्कूल में आकर सीखने को क्यूँ नहीं कहता, रामू जवाब देता है – “ मैं बोलता हूँ, बट दे डोन्ट कम.” दरअसल रामू और उसके दोस्तों के बीच फ़र्क सिर्फ़ उनके विद्यालय का है क्योंकि रामू कलकेरी संगीत विद्यालय में पढ़ता है । कलकेरी कर्नाटक के हुबली-धारवाड़ ज़िले में स्थित एक इलाका है और इस क्षेत्र में होने के कारण ही इस विद्यालय का नाम कलकेरी संगीत विद्यालय है  जहां केवल संगीत की शिक्षा नहीं मिलती बल्कि अन्य विषयों की शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी मिलते हैं ।

रामू, छात्र, कलकेरी संगीत विद्यालय
रामू, छात्र, कलकेरी संगीत विद्यालय

ये दिन था जागृति यात्रा 2015 के तीसरे दिन और पहले पड़ाव धारवाड़ में रोलमॉडल्स से मिलने का। हुबली- धारवाड़ स्थित कलकेरी  संगीत विद्यालय में पढ़ने वाले लगभग 250 बच्चों को वो सब मिलता है जिसकी हम किसी आम विद्यालय में कल्पना भी नहीं कर सकते । यह इस क्षेत्र के आर्थिक रूप से कमज़ोर और ग़रीब परिवार से आने वाले बच्चों के लिए एक आवासीय विद्यालय है जो लगभग गुरूकुल की तरह संचालित होता है । इन बच्चों को कलकेरी में रहकर ही देश-विदेश के शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त होती है जो कि स्वेच्छा से बिना किसी शुल्क के इन्हें पढ़ाने दूर- दूर से आते हैं ।

आपको अपनी ज़िन्दगी से कितनी ही शिक़ायतें होंगी । रहने को आलीशान और सभी सुविधाओं से भरा घर चाहिये होगा। एक बड़ी गाड़ी, एक अच्छी नौकरी,अच्छा जीवनसाथी और न जाने कितनी ही सुविधायें पाने के लिये आप हर दिन जी-तोड़ मेहनत करते होंगे पर एक दूसरे देश में बैठा आदमी इस तथाकथित विकसित जीवनशैली के बीच भी सुकून महसूस नहीं करता और ये सारी सुविधायें छोड़कर आपके देश की संस्कृति से आकर्षित होकर भारत आ जाता है और कर्नाटक के एक अत्यन्त पिछड़े गांव कलकेरी को अपनी कर्मभूमि बना लेता है । फ्रांस से लगभग १४ वर्ष पहले भारत आये एडम वुडवर्ड ने कनाडा से आये मैथ्यू फोर्टियर और उनकी पत्नी अगाथा म्यूराइस के साथ मिलकर कलकेरी संगीत विद्यालय की स्थापना की । एडम जागृति यात्रा के मुसाफ़िरों से वार्तालाप करते हुये कहते हैं कि “धारवाड़ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सरज़मीं है और जब भारत आने के बाद इसी संस्कृति ने उन्हें पाश्चात्य देशों की तथाकथित जीवन-शैली से बाहर निकलकर कलकेरी के ज़रूरतमन्द बच्चों के लिए एक ऐसे विद्यालय की स्थापना के लिए प्रेरित किया जहाँ उनकी प्रतिभा को और निखारा जा सके । संगीत, नाटक और परफॉर्मिंग आर्ट्स के ज़रिए सकारात्मक ऊर्जा को समाज में पुनर्जीवित करने के उद्देशय से कलकेरी संगीत विद्यालय की स्थापना की गई ।” एडम आगे कहते हैं- “मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों में प्रतिभा की कमी नहीं है पर उन्हें अच्छे मौक़ों की ज़रूरत है ।

जहाँ एक ओर जर्मनी से आई लीसा  स्वेच्छा से कलकेरी संगीत विद्यालय के बच्चों को पढ़ाने और उनकी देखभाल करने के लिए भारत आई हैं  और अपने आप को सौभाग्यशाली मानती हैं तो वहीं दूसरी ओर बंगलौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले वरूण भी कलकेरी संगीत विद्यालय के बच्चों को कम्प्यूटर और गणित की शिक्षा देते हैं । वरूण यात्रियों से संवाद करते हुये कहते हैं कि – “जब आप बच्चों के साथ काम करते हैं तो उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं और ये भावनात्मक लगाव आपके भीतर के भावनात्मक और अच्छे इंसान को निखारता है । आपको इतने सारे बच्चों के साथ काम करते हुये बहुत कुछ सीखने का मौक़ा मिलता है ।”

कलकेरी के बच्चों की प्रतिभा देखते ही बनती है । जब पांचवी कक्षा में पढ़ने वाली तेजस्विनी अपनी इच्छा बताते हुये कहती है कि वो बड़े होकर प्राध्यापक बनना चाहती है तो मासूमियत से कही गई उसकी इस बात पर यात्रियों के बीच तालियों का शोर गड़गड़ा उठता है। कोई बड़े होकर विख्यात संगीतकार बनना चाहता है, कोई पुलिस ऑफिसर तो कोई हिन्दी का प्रोफेसर । जब ये बच्चे प्रस्तुति देने मंच पर उतरते हैं तो पूरे वातावरण में उनकी मासूमियत और सकारात्मक ऊर्जा की वर्षा होने लगती है । ‘देखो सखी बरसन को आये बदरवा’ गीत से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आगाज़ होता है और ये सिलसिला आगे बढ़ते हुये ‘गाईये गणपति गजवन्दन’ , ‘मोहे रंग दो लाल’ और राजस्थानी लोकगीत ‘ओ म्हारी घूमर छे नखराली माये, घूमर रमवा मैं जा स्यान’ जैसे गीतों से पूरा माहौल बदल जाता है । ऐसा लगता ही नहीं कि हम दक्षिण भारत के किसी गाँव के स्कूल में आये हैं । इस कार्यक्रम के माध्यम से भारत की अनेकता में एकता की झलक साफ दिख पड़ती है । इस तरह कलकेरी संगीत विद्यालय में संगीत, नाटक, वाद्य यंत्रों तथा परफॉर्मिंग आर्ट्स पर अधिक ध्यान दिया जाता है । एडम और उनकी टीम सरकारी फण्ड के भरोसे न रहकर बाज़ार से फण्ड जुटाने की कोशिश करते हैं जिसकी मदद से इन बच्चों की शिक्षा, खाना-पीना आदि का ख़र्चा पूरा हो पाता है ।

KALKERI

यात्रा के इस दूसरे पड़ाव हुबली-धारवाड़ के कलकेरी गांव में एक और रोल मॉडल सेटअप से  यात्रियों का सामना हुआ । सेल्को (SELCO) जिसकी सहायता से पूरे गांव को सौर ऊर्जायुक्त बनाकर बिजली कटौती की समस्या का समाधान किया गया है । सेल्को की स्थापना 1995 में रमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित हरीश हांडे द्ववारा की गई जो कि सामाजिक क्षेत्र के उद्यमी रहे हैं । सेल्को की तरफ से अदिति और शांति ने यात्रियों को सेल्को के बिज़नेस मॉडल, उनकी सेवायें और उससे जुड़ी उनकी जिज्ञासाओं का समाधान भी किया । धारवाड़ को पेड़ानगर के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यहां के पेड़े अत्यन्त प्रसिद्ध है ।

परिचित बनने की राह में….

#जागृति यात्रा 2015 (25 दिसम्बर, दूसरा दिन,रेल का सफ़र)

जागृति यात्रा का सफ़र मुम्बई आईआईटी में हुये परिचय सत्र से 24 दिसम्बर को शुरू हुआ । ऊर्जा से भरे सभी यात्रियों ने मुम्बई के छत्रपति शिवा जी स्टेशन पर पहली बार वो रेल देखी जिसमें वो अपने अगले 15 दिन बिताने वाले थे । अगले 15 दिन इन यात्रियों के लिये ये रेल ही अपना घर बनने वाली थी। इस तरह 24 दिसम्बर की रात 450 यात्रियों, लगभग 75 समन्वयकों और 30 ईआरसी (इंजन रूम क्लब)और अन्य टीम सदस्यों के साथ ये काफ़िला लगभग 600 की संख्या भी पार कर चुका था ।

यात्रा शुरू होने के अगले दिन से ही शुरू हुआ जागृति यात्रा का एक अविस्मरणीय सफ़र जहाँ क्रिसमस के मौक़े पर ये सभी यात्री अपने घरों से दूर एक नई शुरूआत कर रहे थे । यात्रा का पहला दिन “जीवन रेखा अभ्यास” (लाइफ लाइन एक्सरसाइज़) के साथ शुरू हुआ ।

Continue reading

JEN, a new edge to building middle India

Jagriti Enterprise Network (JEN) is yet another initiative by the core team of Jagriti to go a step ahead in its goal of building India through enterprises. It aims to institutionalise the wide and diverse network created out of the yatra each year and contribute a share to the development of middle India by enhancing the enterprise ecosystem. It enables the enterprise ecosystem accessible in small towns and villages through its network of facilitators at the district level.

JEN is closely linked to the JEC, which stands for elaborated as Jagriti Enterprise Network. In short JEC is the brick and mortar institution while JEN is the blood and sweat of Udyam Corps, and works for a common goal of building India through enterprises. Udyam Corps is the selected employees of JEN and they act as facilitators to bring in the support of the entrepreneurial network to the people in the underprivileged areas. They act as a support system for small and medium enterprises to get access to the top level management of organisations.

JEN aims to boost the entrepreneurial activity especially, in middle India by implementing a district level development framework and works at the grass root level in each district. JEN works with rural entrepreneurs by providing incubation facilities, giving access to funding sources, finding out the potential markets and helping to accelerate the business growth by proper planning and strategy implementation. Furthermore, local collaboration as well as exposure to the outer world is provided.

Hardly a year after its inception, JEN is now supporting three business projects in Deoria, an undeveloped village in the outskirts of Uttar Pradesh. By taking support of the JY network spread across the country, JEN has been able to help entrepreneurs to find potential markets to sell their products. JEN has a five member team dedicated to boosting the enterprise ecosystem in the selected locations initially and have already secured support from organisations like Tata Trust.

Amit Raj, who spearheads the JEN, was a facilitator during Jagriti Yatra in 2014. He is an alumnus of Indian Institute of Mines, Dhanbad, and has proven expertise in leadership, business development, and technology led business transformation. He has been working with Infosys for almost a decade in Australia, before he joined with JY. However, his entry into the JY family was pretty coincidental, although he was looking forward to volunteering opportunities in social sector back in India.

According to Amit, the attitude towards starting an enterprise among the communities in middle India has a long way to go. The major challenge JEN faces is to change the mindset of the people and they provide awareness programs for starting enterprises to meet the goal. As part of expanding the awareness about entrepreneurship, there are 12 yatris from Deoria in Jagriti Yatra 2015.

The mission of JEN is to nurture around 1 lakh entrepreneurs by 2022, when India celebrates its 75th Independence Day.Both JEN and JEC is part of a national mission of creating four centres of enterprise in four chosen cities, namely Deoria in Uttar Pradesh, Kajrat in Maharashtra, Madurai in Tamil Nadu, and Ganjam in Orissa. JEN looks forward to support around a hundred of enterprises and thereby provide employment for 1000 people by 2017.

This yatri has a different story to share!

#meettheyatri: Usha Gehlot

Jagriti Yatra will have on board around 450 amazing youths every year for the biggest entrepreneurial movement happening on the rails. Selectors are dedicated in bringing out the real gems out of the thousands of applications submitted each year, and ensure that every single group consist of people from different backgrounds. Ask anyone what is the best part of being a yatri and the answer would be certainly the experience of spending 15 days with people from diverse culture and background in train.

Here is our yatri Usha Gehlot, a lean lady, dressed in traditional Rajasthani choli, accompanied with her husband at the grand launch ceremony of Jagriti Yatra at the convocation hall at IIT Bombay. She has an entirely different story to share about her joining in Jagriti Yatra 2015.

Hailing from a shady village in rural Rajasthan called Balotra, the 35 year old is a mother of three children. Her husband, Kishen, was a yatri in 2014, and he was really overwhelmed by the innovative ideas and positivity shared by the fellow yatris during the trip.

Kishen says, “In our village people are ignorant about the innovative changes happening around the nation and rather stay reluctant to think differently. I got an amazing opportunity to become a yatri the previous year and could realise the possibility of doing something innovative. I want my wife to experience the same. Despite the dislike from the family and villagers, I want her to be a part of Jagriti Yatra.”

Usha did not have the privilege of getting good education and furthermore she was married at an early age. However, she is self employed presently and runs a small scale unit that produces inner garments for ladies. Spending few minutes with Usha would give you real insights on rural community living in Rajasthan. She is an active participant in woman self help groups in the village as well. She looks forward to mingle with people and expand her knowledge horizons by being part of this yatra.

एक पत्थर ज़रा तबियत से उछालो यारों…

कौन कहता है, आसमां में सुराख़ नहीं होता,

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों ।।

इसी तबियत और इसी मिजाज़ से बनी कुछ युवाओं की प्रेरणादायक कहानियां जो आपको सोचने पर मजबूर कर देती हैं और आपके भीतर जागृति का संचार करती हैं । ऐसी ही सैकड़ों कहानियों का ख़जाना है जागृति रेल यात्रा। एक ऐसी यात्रा जो आपको केवल मध्य भारत के दर्शन ही नहीं कराती बल्कि आपको अपने भीतर झांकने का मौक़ा भी देती है । अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में उलझ कर हम अपने भीतर छिपी ऊर्जा और संभावनाओं को देख नहीं पाते । उन छिपी हुई संभावनाओं और ऊर्जा से आप तब रूबरू होते हैं जब महाराष्ट्र के वडाली से आई सविता मुंडे को उद्यम के ज़रिये अपनी क्षमताओं का विस्तार करते हुये पाते हैं । रेल के ज़रिए लगभग 800 किमी. तक चलने वाली जागृति  यात्रा ऐसी ही प्रतिभाओं से आपका परिचय करवाती है। इन युवाओं को देखकर आपके भीतर सुस्त पड़ी चिंगारी जाग्रत हो उठती है और आप स्व-जागृति के पथ पर निकल पडते हैं । ये जाग्रत यात्री जब अपनी उद्यमशाला का निर्माण करते हैं तो ये ‘यात्रीप्रन्योर’ अर्थात् यात्रा उपरान्त बने उद्यमियों की सूची में शामिल हो जाते हैं । इन्हीं में से एक हैं 2012 की यात्री रही सविता मुंडे ।

Continue reading

जागृति की ओर पहला क़दम

#जागृति यात्रा 2015 (24 दिसम्बर, पहला दिन, पहला पड़ाव, मुम्बई- आरम्भिक- सत्र)

चारों ओर चहल-पहल थी, शोर था, नये चेहरे एक दूसरे से टकरा रहे थे और अपने अजनबी भावों को बदलते हुये परिचित बनने का प्रयास कर रहे थे । कोई सामान जमा करने के लिए लम्बी कतार में लगा था तो कोई पंजीकरण के लिए अलग-अलग काउन्टरों पर खड़ा था लेकिन फिर भी किसी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी । ये किसी राशन की दुकान या किसी सरकारी कार्यालय में लगने वाली कतार नहीं थी । ये कतार थी भारत के जोश और जुनून से भरे उन चुनिन्दा युवाओं की जो ज़िन्दगी को अलग नज़रिये से देखना चाहते थे। कुछ को पता था कि उन्हें क्या करना है तो वो ये जानने आये थे कि कैसे करें ? और कुछ ऐसे थे जिन्हें ये पता ही नहीं था कि उन्हें क्या करना है पर वो ये ज़रूर महसूस करते थे कि उन्हें कुछ तो अलग करना है । इसी मिली जुली प्रतिक्रिया से बने वातावरण के बीच जागृति यात्रा का सफ़र 2008 से चलकर 2015 तक आ पहुंचा था ।

ये दिन था 24 दिसम्बर को आईआईटी मुम्बई में जागृति यात्रा 2015 के शुभारम्भ का जहां देश भर के लगभग 36 राज्यों और 33 विभिन्न देशों के युवा प्रतिनिधि उद्यमिता का मंत्र तलाशने आये थे । सफ़र की शुरूआत आईआईटी मुम्बई में हुये आरम्भिक सत्र से हुई जहाँ जागृति यात्रा के बोर्ड मेम्बर राज कृष्णमूर्ति ने सत्र का आरम्भ किया । यात्रियों का स्वागत करते हुये राज ने उन्हें यात्रा के लिये ज़रूरी निर्देश भी दिये । इस यात्रा के चयन-प्रक्रिया की ख़ासियत बताते हुये कहा कि “इस यात्रा का हिस्सा बनने के लिये आपको किसी बड़ी डिग्री या किसी बड़ी उपलब्धि की ज़रूरत नहीं है । अग़र आप कहते हैं कि आपने कुछ नहीं किया, आपके पास कोई ख़ास शैक्षिक योग्यता नहीं है फिर भी आप इस यात्रा का हिस्सा बन सकते हैं , लेकिन आपके अन्दर कुछ अलग करने का ज़ज्बा होना चाहिए ।”

Continue reading

Zubaan is the highlight of this launch evening!

It is yet another grand launch-event of the Jagriti Yatra, the biggest entrepreneurial event on rails happening on the planet. Excitement is in the air as the yatris are seated in the impressive convocation hall at the IIT Bombay campus. To the surprise of the yatris, the event began with a mesmerising music concert organised by Zubaan, a venture born out of Biz Gyan Tree Exercise, abbreviated as BGT, during the yatra in 2014. Being a part of yatra last year, this writer is really excited to introduce Zubaan here.

Zubaan is the brain child of Kavish Seth, who left his IIT-B alumnus tag to follow his passion which is certainly music. When he became a yatri, he had barely four months more to complete his graduation. Being an enthusiastic traveller, Kavish was someone who would listen to local musicians and singers for hours on end while he roams around with a rucksack. And yes, yatris of 2014 could never forget the soothing guitar music and vocals of Kavish in the train. He is a song writer, singer and guitarist.

Zubaan was born when Kavish’s passion for music met with Neha Arora’s professional expertise in organising events, during one of the countless business discussions that normally happens in the JY train. Neha Arora, another fellow yatri was equally excited about the idea put forward by Kavish during the BGT exercise.

Zubaan conducts Indie music concerts in different parts of the country. The venture aims at providing a platform for rural musicians to explore their talent and earn an income out of it. Furthermore, it is an effort of a music enthusiast to promote indigenous music culture of the nation.

The first Indie music concert of Zubaan took place in Barpar in April 2014, hardly five months after the yatra. By now, the team had conducted seven Indie musical concerts at six different locations of the country and getting ready for an event in Banaras in the following month.

The launch-evening was followed by a music concert by Chintamani, a 56 year old musician, which was primarily organised by Zubaan.

Kavish was just another yatri last year, but at this launch event he is one of the inspiring personalities whom the present yatris got introduced to this evening, and that explains why the yatra is called as the journey of awakening. Congrats to Zubaan team!

नारेबाज़ी से देश नहीं बदलता : शंशाक मणि

‘यार कुछ नया करते हैं’, ‘मैं अपनी ये नाइन टू फ़ाइव की जॉब से बोर हो गया हूँ’, ‘कुछ अलग करना है यार’, ‘भाड़ में गई नौकरी’, ‘अब तो अपना ख़ुद का कुछ करके ही रहूँगा’। आजकल ये वाक्य युवाओं के बीच आमतौर पर सुनने को मिल जाते हैं। ऐसे ही कुछ विचारों से प्रेरित होकर देश के लगभग 34 राज्यों (केन्द्र-शासित राज्यों सहित) से आये यात्रियों ने जागृति यात्रा 2015 के पहले पड़ाव में प्रवेश किया ।

पर्दा उठ चुका है और यात्रा के हर पड़ाव में ढेर सारे नये अनुभवों और अनापेक्षित परिस्थितियों से इन यात्रियों का सामना होगा । आरम्भिक-सत्र में इन चुनौतियों का सामना करने के लिए ज़रूरी मंत्रों और सही दृष्टिकोणों से यात्रियों को रूबरू कराने का प्रयास किया गया ।

Continue reading

The Best Gift is the Interactions

‘The best gift you will get is the interactions with the yatris’

Finally, the curtains are up! It is the day for the launch event of the amazing entrepreneurial event called Jagriti Yatra, simply translated as the ‘journey of awakening’. The annual train journey with 450+ brilliant young minds is about to start in a few hours and the preparations are in full swing. It is sleepless nights and hectic days for the core team as well as the supporting volunteers to make this journey a huge success in its eighth year also. The excitement is at its peak to welcome another set of talented youth, who has been selected as yatris, this year.

The training for the facilitators is a major event that happens every year on the day prior to the yatra. Facilitators, as the name puts it, acts as a bridge between the core team in charge of organising the event and the yatris. We have a group of amazing personalities who have proved their expertise in the area they work on as facilitators this year as well. They are selected after a rigorous screening process to ensure the commitment and ability to make the yatra the most inspiring entrepreneurial journey for the yatris.

 

The facilitators include people from diverse background representing urban, rural, and in-between segments. We have facilitators from 23 countries this year to experience the middle India on Jagriti Yatra Train. The minimum age is 27 for applying as a facilitator.

There are people from countries this time to explore the middle India and travel with the yatris in the train as facilitators. The core team members had a great interactive session during the workshop. Furthermore, they were given an awareness session about the safety measures to be taken in case of emergencies like fire break, terrorist attack, accidents, etc. by Colonel Kaizad Bhaya, a veteran officer, who is also the Train-in-Charge of the Jagriti Yatra.

Here is the take away tip from one of the ex-facilitators Pranjal Modi, who is associated with the organising team since he became a yatri, ‘the best gift the facilitators will get is the interaction between the yatris.’