शौचालय में सोच

“दम लगा, उद्यम बिठा.” “पूरे होंगे स्वप्न-हज़ार, पनपेगा जब उद्यम-विचार.” “ज़ोर लगा के हईशा, उद्यम बिठा के बढ़ता जा.” ऐसी ही कई सारी पंक्तियाँ जागृति रेल यात्रा-2015 के दौरान भावी उद्यमियों से भरी इस रेल के प्रत्येक डिब्बे में मौजूद शौचालयों के बाहर लगाई गई थीं। आपके डिब्बे के शौचालय के बाहर भी आपको ऐसी कोई न कोई पंक्ति ज़रूर मिली होगी।

इस प्रयास के पीछे का उद्देश्य भी यही था कि जब भी यात्री नित्य-क्रिया के लिए शौचालय के आस-पास पहुंचें तो उस समय भी उन्हें ऐसी कुछ रचनात्मक पंक्तियों को देखकर मुस्कुराने और लगातार अपने नये विचार को खंगालते रहने की ऊर्जा मिल सके। यदि ध्यान देकर सोचिये तो आप पायेंगे कि अक्सर ही बड़े-बड़े रचनात्मक विचार आपको शौचालय में बैठकर ही आते हैं, बस इसी विचार ने जागृति-यात्रा की सोशल मीडिया टीम को इस ओर सोचने और ऐसा रचनात्मक एवं मनोरंजक प्रयोग करने का विचार दिया। आइये उन पंक्तियों पर ज़रा एक नज़र डालते हैं जिन्हें देखकर आप कभी मुस्कुरा पड़े तो कभी अपने साथियों के बीच हंस-हंस कर लोट-पोट होते रहे तो कभी उन्हें अपनी तस्वीरों में सहेजने का प्रयास भी किया। इस पर कुछ यात्रियों की प्रतिक्रिया भी रिकॉर्ड करने की हमने कोशिश की जो कि इस ऑडियो क्लिप में मौजूद हैं। इसे सुनिये और अपनी यादें ताज़ा करके आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये कि आपको ये पंक्तियाँं कैसी लगीं ।

खाओ पापड़ चखो अचार, मन में लाओ उद्यम-विचार ।

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हल्के होने के दौरान ही सबसे भारी विचार आते हैं।

 मित्रों होकर हल्का, मचायें उद्यम का तहलका ।।

दिमाग़ का कचरा खाली कर, उद्यम से विकास शुरू कर ।।

 जागृति एक गतिमान रथ, लेता जो उद्यमिता-व्रत।

 ज़ोर लगा के हईशा, उद्यम बिठा के बढ़ता जा ।

 पाटने को विकास की खाई, जागृति की रेल है आई ।

 खेल-खेल में चलेगी रेल, नव-उद्यमियों का होगा मेल ।

 कब तक करोगे नौकरी की तलाश ?

क्यों नहीं जगाते उद्यम की प्यास ।।

तो आपने अपने डिब्बे के बाहर लगी इन पंक्तियों की ओर ध्यान दिया या नहीं ? और आपके डिब्बे में इनमें से ही कोई पंक्ति थी या फिर इससे भी अलग ? सोच क्या रहे हैं ? यही कि आपके डिब्बे में तो कुछ और ही लिखा था । अरे! तो हमसे भी बांटिये। कमेंट कीजिये, शेयर कीजिये और बताईये कि आपके शौचालय के आस-पास कौन सी सोच थी ! हमें इन्तज़ार रहेगा ।

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महिला सोलर इंजीनियर्स का केन्द्र : तिलोनिया, राजस्थान

# जागृति यात्रा, 06 जनवरी चौदहवां दिन- ग्यारहवां पड़ाव- तिलोनिया,राजस्थान

ढोल-नगाड़ों का शोर, राजस्थानी लोकगीत और विशाल कठपुतली का प्रवेश द्वार पर स्वागत करना, हाथ जोड़ कर खड़े छोटे-छोटे बच्चे पूरी जागृति टीम को नमस्ते कहते हुये वातावरण में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर रहे थे । मौक़ा था जागृति यात्रा टीम के तिलोनिया राजस्थान स्थित, बेयरफुट कॉलेज परिसर पहुंचने का । पूरे जोश के साथ महिलाओं, बच्चों और स्थानीय लोगों ने अपनी स्थानीय संस्कृति से सभी का स्वागत करके यात्रियों को आत्मविभोर कर दिया ।

महिला सदस्यों ने लोकगीत के बाद “हम भारत की नारी हैं, फूल नहीं चिंगारी हैं.” जैसे नारों से दिन के कार्यक्रम की शुरूआत की। चारों तरफ़ हम सब एक हैं और हमारा नारा, भाईचारा जैसे नारे गूंज रहे थे । ये नज़ारा था सोलर इंजीनियर्स का घर कहे जाने वाले क़स्बे तिलोनिया का जो कि अजमेर के निकट- किशनगढ़, राजस्थान से लगभग 25 किमी. की दूरी पर स्थित है। तिलोनेिया के बेयरफुट कॉलेज में महिलाओं को सौर ऊर्जा की तकनीकों और यंत्रों को बनाने की ट्रेनिंग देने के साथ-साथ स्वच्छता, महिला शिक्षा तथा स्थानीय लोगों के कौशल का प्रयोग करके इस क़स्बे का विकास करने जैसे कार्यक्रम चलाये जाते हैंं ।

दूसरे सत्र के दौरान यात्रियों को 1972 में स्थापित बेयरफुट कॉलेज के संस्थापक एवं सामाजिक कार्यकर्ता बंकर रॉय से उनके अनुभवों को सुनने का मौक़ा मिला । बंकर रॉय ने अपने अनुभवों को साझा करते हुये कहा – “आप जितनी ज़्यादा उच्च डिग्री प्राप्त करते हैं, आपमें जोख़िम उठाने की क्षमता कम होती जाती है। हमारी औपचारिक शिक्षा पद्धति हमें असली भारत के दर्शन नहीं कराती.” “बिज़नेस मॉडल की नहीं साझेदारी मॉडल की बात कीजिये जैसा कि गांधी जी कहते थे कि ये धरती सभी इंसानों की ज़रूरतों के लिए पर्याप्त है लेकिन एक आदमी के लालच के लिए पर्याप्त नहीं है ।” हम अपनी सोलर कुकर वर्कशॉप में लर्निंग बाइ डूइंग और डूईंग बाई लर्निंग पद्धति के ज़रिए महिलाओं को सिखाते हैं ।

बंकर रॉय
बंकर रॉय

बेयरफुट परिसर में काम सीखने वाली महिलाओं को बंकर रॉय और उनकी टीम सोलर इंजीनियर कह कर बुलाते हैं । यात्रियों को आदर्श ग्राम कहे जाने वाले तिलोनिया के विकास में प्रमुख भूमिका निभाने वाली महिलाओं से परिचित होने और उनके अनुभव सुनने का मौक़ा मिला । ये महिलायें सोलर कुकर निर्माण, वेल्डिंग, कटिंग ये सारा काम इस गांव में रह कर करती हैं । सोलर कुकर, वाटर हीटर बनाती हैं ।

शहनाज़ एक महिला कार्यकर्ता इस बारे में अपने अनुभव साझा करते हुये कहती हैं- “सोलर कुकर में रेखागणित की ज़रूरत लगती है । एक-एक दो दो एम एम की गड़बड़ से वो काम नहीं करेगा। मैं बेयरफुट कॉलेज आई तो तीसरी कक्षा तक पढ़ी थी । यहीं आ के थोड़ा बहुत हिन्दी, अंग्रेज़ी बोलना सीखा ।”

बेयरफुट कॉलेज महिलाओं के विकास के लिए विशेष प्रावधान करके चलते हैं । एक महिला कार्यकर्ता जो कि बेयरफुत के लिए काम करती हैं और गांव के सरपंचों में भी सम्मिलित रही हैं, उनका कहना था कि – “ हर महिला में क्षमता होती है लेकिन उन्हें अवसर मिलना चाहिये कि वो आगे बढ़ सकें । सामाजिक विकास केवल भौतिक विकास से सम्भव नहीं होगा । मानसिक तौर पर जुड़ना ज़रूरी है । आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना आवश्यक है । महिलाओं के पास कोई विशेष कौशल नहीं था । शोध में पता चला कि सबसे बड़ी कमी ये थी कि वो महिलायें थी । हमने पाया कि उन पर काफ़ी पाबन्दियां थीं ।

महिलाओं पर होने वाले शारीरिक अत्याचारों पर भी हमने अध्ययन किया और फिर उन्हें सशक्त बनाने का प्रयास किया । तिलोनिया से इन महिलाओं का जुड़ाव इस स्तर का है कि दूर गांवों में होने वाली घटनाओं की ख़बर भी तिलोनिया तक पहुँचती है ।  महिलायें इस तरह जुड़ गई थीं कि बलात्कार जैसी घटनाओं की रिपोर्ट भी हम तक पहुँच रही थी । तिलोनिया को अपना पीहर समझती हैं महिलायें  और काफी गांवों के बीच हमारा नेटवर्क है।

इस समय अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ज़िम्बाबवे से आई हुई महिलायें भी यहां सोलर कुकर, सोलर लालटेन और सोलर पैनल बनाने के विषय में जानकारियाँ प्राप्त कर रही हैं और सोलर इंजीनियर बनने की राह पर अग्रसर हैं । इन महिलाओं ने  अपने अंदाज़ में यात्रियों के लिए ज़ाम्बिया नृत्य भी प्रस्तुत किया और ‘वी शॉल ओवर कम’ गीत भी प्रस्तुत किया ।

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जूड केली जो कि यूरोप में सांस्कृतिक क्षेत्र में काफ़ी समय से काम कर रही हैं, महिला रोल मॉडल के रूप में सत्र का हिस्सा रहीं और यात्रियों से अपने विचार साझा किये ।

बिज़ ज्ञान ट्री के विजेता….

बिज़ ज्ञान ट्री यानि कि बिज़नेस ज्ञान ट्री जिसका प्रतीक है बरगद का एक वृक्ष । देवरिया पहुँचकर सभी यात्रियों ने उस बरगद के वृक्ष के दर्शन किये । बरगद के वृक्ष को इस प्रतियोगिता का केन्द्र बिन्दु और प्रतीक चुनने के पीछे की वजह बताते हुये जागृति के चेयरमेन शशांक मणि बताते हैं कि पुराने समय में हम इसी बरगद के वृक्ष के नीचे गुरूकुल पद्धति के तहत ज्ञान प्राप्त करते थे । उसी पद्धति का अनुकरण करते हुये बिज़नेस ज्ञान ट्री की संकल्पना की गई । इस प्रतियोगिता के विजयी रहे प्रतिभागियों के नवीन विचार इस प्रकार रहे ।

बिज़ ज्ञान ट्री प्रतियोगिता में टीम ‘आईरा’(AIRA)  कृषि एवं कृषि-व्यवसाय श्रेणी की विजेता रही । ‘आईरा’  संस्कृत भाषा का शब्द है और इसका अर्थ है – ताज़गी (रिफ्रेशमेन्ट) । इस समूह का आयाम कृषि पर आधारित रहा और इस समूह ने कपास के बीज से उत्पादित दुग्ध उत्पादों के निर्यात  की योजना प्रस्तुत की ।

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उद्यम कोर्प के जीवन का एक दिन

राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा होना जितना रोमांचित करने वाला होता है उतना ही चुनौतीपूर्ण भी और साथ ही इस प्रक्रिया का हिस्सा बनकर आपको एक संतुष्टि का अनुभव भी होता है । राष्ट्र्-निर्माण की ये भावना ही है जो एक अति उत्साही और ऊर्जावान युवा को अपने विशेष कौशल और अपने तकनीकी ज्ञान के प्रयोग द्वारा एक उद्यम कोर्प बनकर बेहतर राष्ट्र बनाने के लिए उत्साहित करती है।

आप सोच रहे होंगे ये उद्यम कोर्प कौन है ?

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ये यात्री कुछ ख़ास है…

बाधाओं से ज़रा हाथ मिलाकर तो देखिये, मुश्क़िलों को ज़रा क़रीब जाकर तो देखिये,

ज़िद ठानिये कुछ नया करने की जो अग़र, तो ज़िद को ही अपनी ढाल बनाकर तो देखिये।

ऐसी ही ज़िद, जुनून और दिल में बदलाव की बयार लिए 22 साल का एक नवयुवक भारत-यात्रा पर निकला है । कुछ सपने तलाशने, कुछ नया करने, देश के विकास की एक मज़बूत कड़ी बनने । नाम है – ‘प्रेम सिंह दांगी’।

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नये साल में बिज़ ज्ञान ट्री की तैयारियां..

#जागृति यात्रा (1 जनवरी, नौवां दिन- रेल यात्रा) बिज़ ज्ञान ट्री

जागृति यात्रा का काफ़िला अपने सफ़र के नौवें दिन बिज़ ज्ञान ट्री की दुनिया में प्रवेश कर चुका है । बिज़ ज्ञान ट्री उद्यमिता (आंत्रप्रन्योरशिप) का ऐसा वृक्ष है जिसमें रोज़गार का फल पनपता है, विकास की शाखायें पल्लवित होती हैं । नये व्यवसाय का बीज बड़ा होकर देश के विकास में अपनी भूमिका निभाता है । बिज़ ज्ञान ट्री के माध्यम से यात्रियों के लिए एक ऐसी वर्कशॉप का आयोजन किया जाता है जहाँ वो एक ग्रामीण पृष्ठभूमि में वहां की क्षेत्रीय शासकीय ईकाईयों से संवाद स्थापित करके उस क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक ज़रूरतों को समझते हैं और  अपने व्यवसाय की नींव रखते हैं और पहले स्तर की योजना बनाते हैं । इसी शुरूआती योजना को इन युवा उद्यमियों द्वारा भविष्य में ज़रूरत के अनुसार सुधार कर अपने उद्यम के रूप में तैयार किया जाता है ।

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अक्षयपात्रा से गीतम तक….

#जागृति यात्रा (30 दिसम्बर, सातवां दिन – पांचवां पड़ाव – विशाखापट्टनम)

30 दिसम्बर को जागृति रेल यात्रा विशाखापट्टनम, आंन्ध्र-प्रदेश पहुँची जहाँ यात्रियों ने अक्षय-पात्रा फाउण्डेशन के बिज़नेस मॉडल को समझा । अक्षयपात्रा फाउण्डेशन, हैदराबाद के अध्यक्ष और अक्षयपात्रा नेशनल गर्वनिंग कांउसिल मेम्बर श्रीमन सत्या गौरा चन्द्र दासा यात्रियों से रू-ब-रू हुये और उन्होंने बताया कि किस तरह अक्षयपात्रा की शुरूआत एक मन्दिर के बाहर ग़रीब लोगों को भूखा देखकर खाना खिलाने के एक विचार से हुई जो बाद में बच्चों को भोजन देने के ज़रिए उन्हें शिक्षा केन्द्र तक लाने का कारण बन गई ।

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A day in the life of an Udyam Corp

Being a part of the nation building process is exciting as well as challenging, and at the same time it gives a feel of contentment. That explains why the job of an Udyam Corp attracts passionate individuals who want to use their skill set and professional expertise in building a better nation.

Wondering who is an Udyam Corp? In simple words, Udyam Corps are the ground soldiers in Jagriti Entrepreneurial Network. Their workspace shifts from under a banyan tree in a rural village to lavishly created corporate institutions. They deal with top notch business magnets as well as spend time with struggling rural farmers. They enjoy high professional growth while contributing to nation building on a greater level.

Udyam Corps are those selected employees who work at the grass root level in chosen locations, to promote the enterprise eco system by facilitating the support system for small and medium businesses. They act as connectors between grass root level small and medium business owners to top level managements. Furthermore, they make sure to utilise the wide and diverse network of yatris of Jagriti Yatra in every aspects of business formation and the entrepreneurial journey that follows as well.

A day in the life of an Udyam Corp is never confined to a designated office space. They work and interact with people on locations where Jagriti Entrepreneurial Centre focuses on. Enhancing local collaborations is one of the primary responsibilities of Udyam Corps. The rural folks often lack opportunities to intermingle with people from the outside world and that keeps them in dark. Udyam Corps create opportunities for the villagers to meet with successful individuals, and also to know about the advancements happening around the world in their field of work.

While creating awareness about entrepreneurship, Udyam Corps ensure that they cultivate a strong bonding with the people to help them out in excelling in their field of business. Apart from analysing the business model, they help them in value chain analysis, cost benefit analysis, pricing, etc. In short, they act as a business consultant for the unprivileged people in Middle India, and that is where the analytical excellence and professional exposure of the Udyam Corps matter. The job of Udyam Corp is extended to ensuring that proper support reaches the entrepreneur on terms of funding, technology, resources, etc.

To be an Udyam Corp you need to have a strong passion towards developing Middle India, other than professional experience and academic excellence. Leadership qualities, organisational management, capability to adapt to challenging situations, etc also matters. By boosting the entrepreneurial ecosystem, JEN hopes to meet the goal of enterprise led government.

‘Revolution should be evergreen’

Destination 4: M S Swaminathan Foundation, Chennai

‘The talk over green revolution is ending. Now it is time for evergreen revolution.’ As goes the message from the father of green revolution, M S Swaminathan. The fourth destination of Jagriti Yatra, on its sixth day, was at M S Swaminthan Research Foundation, Chennai, during when the founder himself gave a lecture on agriculture revolution.

His message for the yatris goes as, ‘Jagriti Yatra is a wonderful idea, as you get the glimpse of India, the diversity and pluralism, and the pluralism is the strength of India. Diversity of people, languages, cuisines; we must nurture it, protect it, promote it. Make the best of everyday you have left on the yatra.’

Yatris had a great opportunity to visit the institution dedicated to research on sustainable agriculture and rural development. It was started in 1988 with an aim to accelerate use of modern science for agricultural and rural development for development and dissemination of technology to improve the lives and livelihoods of tribal and rural communities.

Yatris who have selected agriculture as their vertical of interest had an unforgettable day spending on the premises of the research institution. The speech was enlightening as well.

The yatra has crossed over five destinations by now, and the excitement of yatris is not setting down and that makes Jagriti Yatra the journey of life time.

Focus on healthcare on third role model visit

Destination 3: Arvind Eye Care, Madurai

The importance of health care can never be minimised on any conditions and in a developing country like India the government cannot alone meet the health care needs of its people, given its growing population, income status and inadequate infrastructure. That is why entrepreneurial ventures in healthcare sector is really a need of the hour.

Dr. Venkataswamy, founder of Arvind Eye Care, wishes to establish an alternate health care model that could supplement the efforts of the government and also be self supporting. The third destination of Jagriti Yatra 2015 focused on the health care sector, and yatris spent a day analysing and understanding Arvind Eye Care and AuroLab.

Situated in the temple city of Madurai, Arvind Eyecare has become the final word for best eye care treatment for almost four decades now. Aurolab, started in 1991, is a pioneer in the production of high quality ophthalmic consumables at affordable prices to developing countries.

A visit to Arvind eye care and the interaction with the founder made the third role model visit of Jagriti Yatra wonderful and inspiring.